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UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 2 उद्भिज्ज परिषद् (गद्य – भारती) लघु उत्तरीय प्रश्न

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प्रश्न 1.
मनुष्यों की हिंसा-वृत्ति कैसी होती है?

उत्तर :
मनुष्यों की हिंसावृत्ति की सीमा का कोई अन्त नहीं है। मनुष्य स्वार्थसिद्धि के लिए स्त्री, पुत्र, स्वामी और बन्धु को भी अनायास मार डालता है और केवल मन बहलाने के लिए जंगल में जाकर पशुओं को मारता है। इनकी पशु-हिंसा को देखकर तो जड़ वृक्षों का हृदय भी फट जाता है।

प्रश्न 2.
मनुष्य को किनसे निकृष्ट और किनसे निस्सार बताया गया है?

उत्तर :
मनुष्य केवल पशुओं से ही निकृष्ट नहीं है, वरन् वह तृणों से भी निस्सार है। तृण आँधी के साथ निरन्तर लड़ते हुए वीर पुरुषों की तरह शक्ति क्षीण होने पर ही भूमि पर गिरते हैं। वे कायर पुरुषों की तरह अपना स्थान छोड़कर नहीं भागते। लेकिन मनुष्य पहले ही मन में भावी विपत्ति की आशंका करके कष्टपूर्वक जीते हैं और उसके प्रतिकार का उपाय सोचते रहते हैं।

प्रश्न 3.
‘उद्भिज्ज-परिषद्’ पाठ के आधार पर वृक्षों के महत्त्व पर आलेख लिखिए। 

उत्तर :
[संकेत प्रस्तुत प्रश्न का उत्तर ‘जीवनं निहितं वने” नामक पाठ के आधार पर लिखा जा सकता है, प्रस्तुते पाठ के आधार पर नहीं। इस प्रश्न का उत्तर ‘जीवनं निहितं वने’ नामक पाठ से ही पढ़े।]

प्रश्न 4.
मनुष्य पशुओं से निकृष्ट क्यों है?

उत्तर :
मनुष्य पशुओं से निकृष्ट इसलिए है, क्योंकि पशु तो मात्र अपना पेट भरने के लिए हिंसा-कर्म करते हैं। लेकिन मनुष्य तो पेट भर जाने पर मात्र मनोरंजन के लिए वन-वन घूमकर दुर्बल पशुओं को मारता रहता है।

प्रश्न 5.
वृक्षों की सभा का सभापतित्व किसने किया? उसने मनुष्यों में क्या-क्या दोष गिनाये हैं?
या
वृक्षों की सभा में सभापति कौन था?
 
उत्तर :
वृक्षों की सभा को सभापतित्व अश्वत्थ (पीपल) के एक विशाल वृक्ष ने किया। उसने कहा कि मनुष्य अपनी अवस्था से सन्तुष्ट न रहकर सदैव स्वार्थ-साधन में लगा रहता है। वह सत्य, धर्म, सरलता आदि व्यवहारों को छोड़कर झूठ, पापाचार, परपीड़न आदि में लगा रहता है। उसकी विषय-लालसा निरन्तर बढ़ती ही रहती है, जिससे उसे शान्ति व सुख की प्राप्ति नहीं होती। वह घोर-से-घोर पापकर्म करने में भी नहीं हिचकिचाता। ये ही दोष वृक्षों की सभा में सभा के सभापति द्वारा गिनाये गये।

प्रश्न 6.
हिंसक जीवों की हिंसा और मनुष्य की हिंसा में क्याअन्तर है? भोजन के विषय में पशु-पक्षियों के नियम बताइए। 
या
मनुष्यों एवं पशुओं के हिंसा-कर्म का क्या प्रयोजन है? 

उत्तर :
हिंसक जीवों की हिंसा केवल पेट की भूख शान्त करने के लिए ही होती है। भूख शान्त हो जाने पर वे हिंसा नहीं करते। लेकिन मनुष्य अपनी भूख शान्त करने के लिए तो हिंसा करता ही है अपितु उसके बाद वह मनोरंजन के लिए भी हिंसा करता है। हिंसा तो उसके लिए खेल के समान है। भोजन के विषय में पशु-पक्षियों के निश्चित नियम हैं। मांसाहारी पशु मांस को छोड़कर दूसरी वस्तु नहीं खाते और फल-मूल खाने वाले उसी को खाते हैं, वे मांस नहीं खाते।

प्रश्न 7.
वृक्षों की सभा का विषय क्या है? 

उत्तर :
वृक्षों की सभा का विषय मनुष्यों की हिंसा-वृत्ति और उनका लालची स्वभाव है। इस कारण वृक्षों ने मनुष्यों को पशुओं से ही नहीं वरन् तिनकों से भी निकृष्ट सिद्ध किया है।

प्रश्न 8.
उद्भिज्ज-परिषद् में निकृष्टतम जीव किसको माना गया है?
 
उत्तर :
‘उद्भिज्ज-परिषद्” पाठ में निकृष्टतम जीव मनुष्य को माना गया है।

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