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UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 3 नैतिकमूल्यानि (गद्य – भारती)  पाठ-सारांश 

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नीति का स्वरूप एवं नीति-ग्रन्थ जिस मार्ग से कार्य करने से मनुष्य का जीवन सुन्दर और सफल होता है, उसे नीति कहते हैं। नीतिपूर्वक व्यवहार से केवल मनुष्य या समाज का ही कल्याण नहीं होता अपितु इसके अनुरूप आचरण करने से प्रजा, शासक और सम्पूर्ण संसार का कल्याण होता है। प्राचीन काल से ही नीतिकारों ने नीति-वाक्यों की रचना की; अतः साधारण लोग भी व्यवहार के लिए नीति वाक्यों और श्लोकों को कण्ठस्थ करते हैं। चाणक्यनीति’, ‘विदुरनीति’, ‘विदुलोपाख्यान’, ‘पञ्चतन्त्र’, शुक्रनीति’, ‘नीतिसार’, नैतिकमूल्यानि ‘नीतिद्विषष्टिका’, ‘भल्लाटशतक’, ‘नीतिशतक’, ‘बल्लालशतक’, ‘दृष्टान्तशतक’ आदि संस्कृत के प्रमुख नीतिग्रन्थ हैं।

नीति : काव्य का मुख्य प्रयोजन किसी भी राष्ट्र के साहित्य में उसके प्रारम्भिक काल से ही यह विश्वास प्रचलित था कि नीति-परितोष’ काव्य को एक मुख्य प्रयोजन है। इसीलिए प्लेटो, अरस्तू, पेटर, होरेस इत्यादि पाश्चात्य विद्वानों ने भी काव्य के अनेकानेक प्रयोजनों में नैतिक विकास एवं सन्तोष को काव्य का एक मुख्य साधन माना है।

नैतिकता की आवश्यकता नैतिक मूल्यों से व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है। नैतिकता से ही व्यक्ति, समाज, देश और विश्व का कल्याण होता है। नैतिक आचरण से मानव में त्याग, तप, विनय, सत्य, न्यायप्रियता आदि गुणों का विकास होता है। इसके साथ ही व्यक्ति और समाज ईष्र्या, द्वेष, छल, कलह आदि दोषों से मुक्त होते हैं।

दूसरों का हित नैतिक आचरण का मुख्य उद्देश्य परहित-साधन है। नैतिक आचरण से युक्त मनुष्य अपनी हानि करके भी दूसरों का कल्याण करता है। समाज में प्रचलित रूढ़ियाँ सबके हित के लिए नहीं होती हैं। इसलिए प्रबुद्ध विद्वान् उसका विरोध करते हैं और नवीन आदर्श स्थापित करते हैं, परन्तु उनके ऐसा करने पर भी नैतिक मूल्यों में कोई परिवर्तन नहीं होता है। शाश्वत धर्म सदैव अपरिवर्तनीय होता है और नीति की अपेक्षा अधिक व्यापक भी होता है। नीति से केवल लौकिक कल्याण होता है, जब कि धर्म लौकिक और पारलौकिक दोनों तरह का कल्याण करता है।

धर्म की परिभाषा धर्माचार्यों ने ”यतोऽभ्युदयनिःश्रेयस् सिद्धिः स धर्मः” कहकर धर्म की व्याख्या की है। जिस कर्म से मानव का इस लोक में कल्याण होता है और परलोक में उसे उच्च स्थान प्राप्त होता है, वह धर्म है। मनुस्मृति में धर्म के दस अंग बताये गये हैं–धृति (धैर्य), क्षमा, दान, अस्तेय (चोरी न करना), शौच (पवित्रता), इन्द्रियनिग्रह, धी (बुद्धि), विद्या, सत्य और अक्रोध।

धर्म और नीति तीर्थयात्रा, पवित्र नदियों में स्नान, यज्ञ करना और कराना, गुरु-माता-पिता की सेवा, सन्ध्या-वन्दना और सोलह संस्कार मुख्य रूप से धर्म के वाचक हैं। इन कर्मों में नीति का मिश्रण नहीं है; अतः धर्म व्यापक है। धैर्य, दया, सहनशीलता, सत्य, परोपकार आदि के आचरण में धर्म और नीति दोनों का मिश्रण है। दोनों का समान रूप से आचरण करने से संसार का परम कल्याण होता है। नीतिकारों के मतानुसार-जीव-हिंसा और परधनापहरण से निवृत्ति, सत्यभाषण, चुगलखोरी से मुक्ति, सत्पात्रों और दोनों को दान, लोभ का त्याग, दया, सहनशीलता, परोपकार, श्रद्धा, गुरुजनों में अनुराग, विनयशीलता आदि नैतिकता के गुण हैं। गर्वहीनता, अतिथि-सत्कार, न्याय से अर्जित जीविका, ईर्ष्या का अभाव, सत्संग, प्रेम, दुर्जन-संगतिं का त्याग, धैर्य, क्षमा, वाक्-पटुता, समय का सदुपयोग इत्यादि नैतिकता के आचरणों से व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व का कल्याण होता है।

अत: व्यक्ति को नैतिक आचरण करके अपना, समाज का, देश का और विश्व का कल्याण करना चाहिए।

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गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

1) नयनं नीतिः, नीतेरिमानि मूल्यानि नैतिकमूल्यानि। यथा सरण्या कार्यकरणेन मनुष्यस्य जीवन सुचारु सफलञ्च) भवति सा नीतिः कथ्यते। इयं नीतिः केवलस्य जनस्य समाजस्य कृते एव न भवति, अपितु जनानां, नृपाणां समेषां चे व्यवहाराय भवति। नीत्या चलनेन, व्यवहरणेन, प्रजानां शासकानां समस्तस्य लोकस्यापि कल्याणं भवति। 

शब्दार्थ नयनं = ले जाना। नीतेरिमानि = नीति के ये। सरण्या = मार्ग से। सुचारु = सुन्दर। कथ्यते = कही जाती है। कृते = हेतु, लिए। समेषाम् = सबके। कल्याणं = कल्याण, भला।

सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के गद्य-खण्ड ‘गद्य-भारती’ में संकलित ‘नैतिकमूल्यानि’ शीर्षक पाठ से उधृत है।

[संकेत इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में नीति के स्वरूप एवं प्रयोजन के विषय में बताया गया है।

अनुवाद ले जाना’ नीति कहलाता है। नीति के ये मूल्य (ही) नैतिक मूल्य कहलाते हैं। जिस मार्ग से कार्य करने से मनुष्य का जीवन सुन्दर और अच्छी प्रकार से सफल होता है, वह नीति कहलाता है। यह नीति केवल मनुष्य और समाज के लिए ही नहीं है, अपितु मनुष्यों और राजाओं सभी के व्यवहार के लिए होती है। नीति के द्वारा चलने से, व्यवहार करने से, प्रजा का, शासकों का, सारे संसार को भी कल्याण होता है।

(2) पुरातनकालादेव भारते कवयः नीतिकाराः मनोरमया सरसया गिरा नीतिंवाक्यानि, कथाभिः श्लोकैश्च व्यरचयन्। इत्थं नीतिशास्त्राणि व्यवहारविदे, कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे बभूवुः। फलन्त्विदं सम्पन्नं साधारणाः अपि जनाः व्यवहाराय नीतिवाक्यानि नीतिश्लोकांश्च गलबिलाधः कुर्वन्ति स्म। यथा च चाणक्यनीतिः, विदुरनीतिः, विदुलोपाख्यानम्, पञ्चतन्त्रम्, शुक्रनीतिः, घटकर्परकृतः नीतिसारः, सुन्दरपाण्डेयेन कृता ‘नीतिद्विषष्टिका’, भल्लाटशतकम्, भर्तृहरिकृतं नीतिशतकम्, ‘बल्लालशतकम्’, ‘दृष्टान्तशतकम्’ इत्यादि बहूनि नीतिपुस्तकानि संस्कृते उपलभ्यन्ते। [2012, 15]

शब्दार्थ पुरातनकालादेव = प्राचीन काल से ही। गिरा = वाणी के द्वारा, भाषा के द्वारा। कथाभिः = कथाओं के द्वारा। व्यरचन् = रचना की है। इत्थम् = इस प्रकार व्यवहारविदे = व्यवहार को जानने के लिए। कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे (कान्ता + सम्मिततया + उपदेशयुजे) = स्त्री से सम्मित होने से उपदेश के लिए। गलबिलाधः (गल + बिल + अधः) = गले के छेद के नीचे अर्थात् कण्ठस्था उपलभ्यन्ते = प्राप्त होती हैं।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में नीति के स्वरूप और प्रयोजन को बताते हुए प्रमुख नीति-ग्रन्थों के नाम दिये गये हैं।

अनुवाद प्राचीन काल से ही भारत में कवियों और नीतिकारों ने सुन्दर और सरस वाणी द्वारा कथाओं, श्लोकों से नीति-वाक्यों की रचना की। इस प्रकार नीतिशास्त्र व्यवहार को जानने के लिए, स्त्री से सम्मित होने से उपदेश से युक्त होने के लिए हुए। परिणाम यह हुआ कि सम्पन्न, साधारण लोगों ने भी व्यवहार के लिए नीति-वाक्यों और नीति-श्लोकों को कण्ठस्थ कर लिया था। जैसे कि चाणक्यनीति, विदुरनीति, विदुलोपाख्यान, पञ्चतन्त्र, शुक्रनीति, घटकर्पर द्वारा रचित नीतिसार, सुन्दरपाण्डेय द्वारा रचित नीतिद्विषष्टिका, भल्लाटशतक, भर्तृहरि द्वारा रचित नीतिशतक, बल्लालशतक, दृष्टान्तशतक इत्यादि बहुत-सी नीति पुस्तकें संस्कृत में = प्राप्त होती हैं।

(3) विचार्यमाणे साहित्ये आदिकालादेव सर्वेष्वपि राष्ट्रेषु अयं विश्वासः प्रचलितः आसीत्, यत् काव्यास्योन्येषु )प्रयोजनेषु सत्स्वपि एकं मुख्यं प्रयोजनं नैतिकः परितोषः। प्लेटो, अरस्तू, पेटर, होरेसादि सर्वैः विचारकैः काव्यस्य मुख्यं प्रयोजनं नैतिकविकासः एव स्वीकृतः।

शब्दार्थ विचार्यमाणे साहित्ये = विचार करने पर साहित्य में। आदिकालादेव = आदिकाल से ही। सत्स्वपि (सत्सु + अपि) = होते हुए भी। प्रयोजनम् = प्रयोजन, कारण, हेतु। परितोषः = सन्तोष। स्वीकृतः = स्वीकार किंया गया।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में नीति का प्रयोजन तथा कुछ पाश्चात्य नीतिकारों का उल्लेख किया गया है।

अनुवाद साहित्य में विचार किये जाने पर आदिकाल से ही सभी राष्ट्रों में यह विश्वास प्रचलित था कि काव्य के अन्य प्रयोजनों के होने पर भी एक मुख्य प्रयोजन नैतिक सन्तोष था। प्लेटो, अरस्तू, पेटर, होरेस आदि। सभीविचारकों ने काव्य का मुख्य प्रयोजन नैतिक विकास ही स्वीकार किया है।

(4) नैतिकमूल्यैः व्यक्तेः सामाजिक प्रतिष्ठाभिवर्धते। मानवकल्याणाय नैतिकता आवश्यकी। नैतिकतैव व्यक्तेः, समाजस्य, राष्ट्रस्य, विश्वस्य कल्याणं कुरुते। नैतिकताचरणेनैव मनुष्येषु त्यागः, तपः, विनयः, सत्यं, न्यायप्रियता एवमन्येऽपि मानवीयाः गुणाः उत्पद्यन्ते। नैतिकतया मनुष्योऽन्यप्राणिभ्यः भिन्नः जायते। लदाचरणेन व्यक्तेः समाजस्य च जीवनम् अनुशासितं निष्कण्टकं च भवति। व्यक्तेः समाजस्य, वर्गस्य, देशस्य च समुन्नयनावसरो लभ्यते। समाजः ईष्र्या-द्वेषच्छल-कलहादिदोषेभ्यः मुक्तो भवति। अस्माकं सामाजिकाः, अन्ताराष्ट्रियाः सम्बन्धाः नैतिकताचरणेन दृढाः भवन्ति। अतः नैतिकताशब्दः सच्चरित्रतावाचकः, सुखमयमानवजीवनस्याधारः अस्ति।

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नैतिकमूल्यैः व्यक्तेः ……………………………………….. उत्पद्यन्ते ।

नैतिकमूल्यैः व्यक्तेः …………………………………… मुक्तो भवति

शब्दार्थ अभिवर्धते = बढ़ती है। व्यक्तेः = व्यक्ति का। नैतिकताचरणेनैव = नैतिकता के आचरण से ही। उत्पद्यन्ते = उत्पन्न होते हैं। अन्यप्राणिभ्यः = दूसरे प्राणियों से। समुन्नयनावसरः = ठीक उन्नति का अवसर। मुक्तो भवति = छूट जाता है। सच्चरित्रतावाचकः = सदाचार का वाचक अर्थात् बताने वाला। जीवनस्याधारः = जीवन का आधार

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में नैतिक मूल्यों के आचरण का महत्त्व बताया गया है।

अनुवाद नैतिक मूल्यों से व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है। मानव-कल्याण के लिए नैतिकता आवश्यक है। नैतिकता ही व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व का कल्याण करती है। नैतिकता के आचरण से ही मनुष्यों में त्याग, तप, विनय, सत्य, न्यायप्रियता एवं इसी प्रकार के दूसरे भी मानवीय  गुण उत्पन्न होते हैं। नैतिकता से मनुष्य दूसरे प्राणियों से भिन्न हो जाता है। उसके आचरण से व्यक्ति और समाज का जीवन अनुशासित और निष्कण्टक होता है। व्यक्ति, समाज, वर्ग और देश की उन्नति का अवसर प्राप्त होता है। समाज ईष्र्या, द्वेष, छल, कलह आदि दोषों से मुक्त होता है। हमारे सामाजिक और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध नैतिकता के आचरण से मजबूत होते हैं। अतः ‘नैतिकता’ शब्द सच्चरित्रता का वाचक, सुखमय मानव-जीवन का आधार है।

(5) इदन्तु सम्यक् वक्तुं शक्यते यत् नैतिकताचरणस्य, नैतिकतायाश्च मुख्यमुद्देश्यं स्वस्य अन्यस्य च कल्याणकरणं भवति। कदाचित् एवमपि दृश्यते यत् परेषां कल्याणं कुर्वन् मनुष्यः स्वीयां हानिमपि कुरुते। एवंविधं नैतिकाचरणं विशिष्टं महत्त्वपूर्णं च मन्यते। परेषां हितं नैतिकतायाः प्राणभूतं तत्त्वम्। [2008]

शब्दार्थ इदन्तु = यह तो। सम्यक् = भली प्रकार कल्याणकरणम् = कल्याण करना। कदाचित् = कभी। एवमपि = ऐसा भी। कुर्वन् = करते हुए। स्वीयाम् = अपनी।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में नैतिक मूल्यों के आचरण का महत्त्व बताया गया है।

अनुवाद यह तो भली प्रकार कहा जा सकता है कि नैतिकता के आचरण का और नैतिकता का मुख्य उद्देश्य अपना और दूसरों का कल्याण करना होता है। कभी ऐसा भी देखा जाता है कि दूसरों का कल्याण करता हुआ मनुष्य अपनी हानि भी करता है। इस प्रकार का नैतिक आचरण विशेष और महत्त्वपूर्ण माना जाता है। दूसरों का हित नैतिकता का प्राणभूत तत्त्व है।

(6) कदाचित् एवमपि दृश्यते यत्समाजे प्रचलिता रूढिः सर्वेषां कृते हितकरी न भवति। अतः प्रबुद्धाः विद्वांसः तस्याः रूढः विरोधमपि कुर्वन्ति। परं तैः आचरणस्य व्यवहारे नवीनः आदर्शः स्थाप्यते। यः कालान्तरे समाजस्य कृते हितकरः भवति। एवं सदाचरणेऽपि परिवर्तनं दृश्यते। परं वस्तुतः यानि नैतिकमूल्यानि सन्ति। तेषु परिवर्तनं न भवति। यथा सनातनो धर्मः न परिवर्तते तथा नैतिकमूल्यान्यपि स्थिराणि एव। एवं धर्मे नीतौ च दृढीयान् सम्बन्धो दृश्यते। परं द्वयो भेदोऽपि वर्तते।  धर्मशब्दः व्यापकः अस्ति। नीतिस्तु व्याप्या धर्मे एव विलीयते। यानि अवश्यकरणीयानि कर्त्तव्यानि यैः पुण्यानि नोपलभ्यन्ते तेषामपि गणना धर्मे कृता मेहर्षिभिः धर्माचार्यैः। नीतिः लौकिकं कल्याणं कुरुते। धर्मस्तु लौकिकं पारलौकिकञ्च कल्याणं कुरुते। उभयोः कुत्रापि साङ्कर्त्यमपि प्राप्यते। धर्मः अलौकिक शक्ति प्रकटयति। सः मुक्तेः मार्गमपि प्रशस्तं करोति। परलोकमपि प्रदर्शयति कल्पयति च। नीतिः लौकिकं हितं साधयति। परं नीतिधर्मयोः साहचर्यं सर्वैरेव स्वीक्रियते।

कदाचित् एवमपि …………………………………. स्थिराणि एवं।

धर्मशब्दः व्यापकः …………………………………… संर्वैरेव स्वीक्रियते।

शब्दार्थ रूढिः = पहले से प्रचलित परम्परा प्रबुद्धाः = जगे हुए, जागरूका स्थाप्यते = स्थापित किया जाता है। दृश्यते = दिखाई देता है। कालान्तरे = समय बीतने पर। परिवर्तते = बदलता है। नीतौ = नीति में। दृढीयान् = अधिक छ। व्यापकः = विस्तृत, फैला हुआ। व्याप्या = व्याप्त होने वाली, सीमित स्थान में रहने वाली। विलीयते = विलीन हो जाती है, मिल जाती है। नोपलभ्यन्ते = नहीं प्राप्त होते हैं। पारलौकिकम् = परलोक से सम्बन्धित। कुत्रापि = कहीं भी। साङ्कर्यमपि = मिश्रण भी। प्रशस्तम् = सुन्दर। कल्पयति = कल्पना करता है। साधयति = साधता है, पूरा करता है। स्वीक्रियते = स्वीकार किया जाता है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में नैतिक आचरण, नीति और धर्म के अन्तर तथा साहचर्य पर प्रकाश डाला गया है।अनुवाद कभी ऐसा भी देखा जाता है कि समाज में प्रचलित रूढ़ि (प्राचीन परम्परा) सबके लिए हितकारी नहीं होती है; अतः जागरूक विद्वान् उस रूढ़ि का विरोध भी करते हैं, परन्तु उनके आचरण के व्यवहार में नवीन आदर्श स्थापित किया जाता है, जो कालान्तर में समाज के लिए हितकारी होता है। इस प्रकार सदाचरण करने में भी परिवर्तन दिखाई देता है, परन्तु वास्तव में जो नैतिक मूल्य हैं, उनमें परिवर्तन नहीं होता है। जैसे सनातन (सदा बना रहने वाला, शाश्वत) धर्म नहीं बदलता है, उसी प्रकार नैतिक मूल्य भी स्थिर ही हैं। इस प्रकार धर्म और नीति में दृढ़ सम्बन्ध दिखाई देता है, परन्तु दोनों में अन्तर भी है। धर्म शब्द व्यापक है, नीति तो व्याप्त है, जो धर्म में ही विलीन हो जाती है। जो अवश्य करने योग्य कर्तव्य हैं, जिनसे पुण्य की प्राप्ति नहीं होती है, उनकी गणना महर्षियों और धर्माचार्यों ने धर्म में की है। नीति लौकिक कल्याण करती है, धर्म लौकिक और पारलौकिक कल्याण करता है। दोनों में कहीं मिश्रण भी प्राप्त होता है। धर्म तो अलौकिक शक्ति को प्रकट करता है। वह मुक्ति के मार्ग को भी प्रशस्त करता है। परलोक को दिखाता है। और कल्पना करता है। नीति सांसारिक हित करती है, परन्तु नीति और धर्म का साथ सभी स्वीकार करते हैं।

(7) दार्शनिकैः, धर्माचार्यैः पौराणिकैश्च धर्मः परिभाषितः यथा-“यतोऽभ्युदयनिःश्रेयस सिद्धिः स धर्मः” यतः यस्मात् कर्मणः, इहलोके कल्याणं जायते, परत्र परलोके च शोभनं स्थानं जनैः लभ्यते नरकापातो न भवेत् येन, स धर्मः। एवं महाभारते-ध्रियते धर्मः, धारणाद्धर्मः यतः धारयते प्रजाः। धर्मशास्त्रकारेण मनुना –
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धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।

धीविद्यासत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥

इति मनुस्मृतौ दशस्वरूपको धर्मः उपवर्णितः। इत्थं धर्माचरणे नैतिकताचरणे च साङ्कर्यमुपलभ्यते। शब्दार्थ दार्शनिकैः = दर्शन (शास्त्र) के ज्ञाता। पौराणिकैः = पुराण को जानने वाले परिभाषितः = परिभाषित किया गया। अभ्युदय = उन्नति, समृद्धि। निःश्रेयस् सिद्धिः = कल्याण की प्राप्ति होती है। परत्र = दूसरे स्थान पर, परलोक में। लभ्यते = प्राप्त किया जाता है। नरकापातः = नरक में गिरना। धियते = धारण किया जाता है। धृतिः = धैर्य। दमः = दमन करना। अस्तेयम् = चोरी करना। शौचः = पवित्रता। धीः = बुद्धि। उपवर्णितः = उल्लिखित, वर्णित। साङ्कर्यम् = मिश्रण।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में धर्म की परिभाषा दी गयी है तथा धर्म के दस लक्षणों का उल्लेख भी किया गया है।

अनुवाद दार्शनिकों, धर्माचार्यों और पौराणिकों ने धर्म की परिभाषा दी है; जैसे-“जिससे उन्नति और कल्याण की प्राप्ति होती है, वह धर्म है। जिस कर्म से इस संसार में कल्याण होता है, परलोक और इस लोक में जिससे लोगों को सुन्दर स्थान प्राप्त होता है, नरक में पतन नहीं होता है, वह धर्म है। इसी प्रकार : महाभारत में कहा गया है कि “धारण किया जाता है, वह धर्म है। जिसे प्रजा को धारण कराया जाता है, वह धर्म है।” धर्मशास्त्रों के रचयिता मनु ने कहा है-“धैर्य, क्षमा, संयम, अचौर्य, शौच (पवित्रता), इन्द्रिय-निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य, अक्रोध-ये दस धर्म के लक्षण हैं।”

मनुस्मृति में ऐसे दस स्वरूप वाले धर्म का वर्णन है। इस प्रकार धर्माचरण और नैतिकता के आचरण में मिश्रण प्राप्त होता है।

(8) तीर्थाटनं, पावनासु नदीषु स्नानं, यजनं, याजनं, गुरुसेवा, मातृपितृसेवा, सन्ध्यावन्दनं, षोडशसंस्काराः एते मुख्यरूपेण धर्मपदवाच्याः। एषु कर्मसु नीतेः मिश्रणं नास्ति। अतः धर्मो व्यापकः। धृति-दया-सहिष्णुता-सत्य-परोपकाराद्याचरणेषु द्वयोः साङ्कर्यमस्ति। परमेतत् निश्चितं यत् द्वयोराचरणेन लोकस्य परमं कल्याणं जायते एव। नीतिकाराणां मते इमे नैतिकतायाः गुणाः यथा–जीवहिंसायाः विरक्तिः, परधनापहरणान्निवृत्तिः, सत्यभाषणं, पैशुन्यात् निवृत्तिः, सत्पात्रेभ्यः दीनेभ्यश्च दानं, अतिलोभात् वितृष्णा, दया, सहिष्णुता, परोपकारः, गुरुजनेष्वनुरागः, श्रद्धा, विनयशीलता च। अनुत्सेकः, आतिथ्यं, न्याय्यावृत्तिः, परगुणेभ्यः ईष्र्याऽभावः, सत्सङ्गानुरक्तिः, दुष्टसङ्गान्निवृत्तिः, विपदि धैर्यम्, अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता, समयस्य सदुपयोगः इत्यादयः नैतिकताचाराः एषामाचरणेनैव व्यक्तेः समाजस्य, राष्ट्रस्य विश्वस्य च सर्वथा कल्याणं सम्पद्यते।

तीर्थाटनं, पावनासु ……………………………………… विनयशीलता च। 

तीर्थाटनं, पावना …………………………………. जायते एव।

शब्दार्थ पावनासु = पवित्रों में। यजनम् = यज्ञ करना। याजनं = यज्ञ कराना| नास्ति = नहीं है। परमेतत् = किन्तु यहा विरक्तिः = त्याग, छोड़ना। परधनापहरणात् = दूसरों का धन छीनने से। निवृत्तिः = छुटकारा। पैशुन्यात् = चुगली करने से। वितृष्णा = विरक्ति, अनिच्छा। अनुत्सेकः = गर्वहीनता। न्याय्यावृत्तिः = न्याय से अर्जित जीविका। विपदि = विपत्ति में। अभ्युदये = उन्नति में। सदसि = सभा में। वाक्पटुता = बोलने की कुशलता। सम्पद्यते = सम्पन्न होता है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में धर्म और नैतिकता के गुणों को बताया गया है और उन्हें अपनाने की प्रेरणा दी गयी है।

अनुवाद तीर्थयात्रा, पवित्र नदियों में स्नान, यज्ञ करना, यज्ञ कराना, गुरु-सेवा, माता-पिता की सेवा, सन्ध्या-वन्दना आदि सोलह संस्कार-ये मुख्य रूप से धर्म शब्द के वाचक हैं। इन कामों में नीति का मिश्रण नहीं है; अत: धर्म व्यापक है। धैर्य, दया, सहनशीलता, सत्य, परोपकार आदि के आचरणों में दोनों (धर्म और नीति) का मिश्रण है। परन्तु यह निश्चित है कि दोनों के आचरण से संसार का अत्यधिक कल्याण होता ही है। नीतिकारों के मत में ये नैतिकता के गुण हैं; जैसे—जीवों की हिंसा से वैराग्य, दूसरों के धन के चुराने से छुटकारा, सत्य बोलना, चुगलखोरी से छुटकारा, सत्पात्रों और दोनों को दान देना, अधिक लोभ से विरक्ति, दयो, सहनशीलता, परोपकार, गुरुजनों पर अनुराग, श्रद्धा और विनयशीलता, गर्वहीनता, अतिथि-सत्कार, न्याय से अर्जित आजीविका, दूसरों के गुणों में ईष्र्या का अभाव, सत्संग में अनुरक्ति, दुर्जनों की संगति से छुटकारा, विपत्ति में धैर्य धारण करना, उन्नति में क्षमाभाव, सभा में बोलने की चतुराई, समय का सदुपयोग इत्यादि नैतिकता के कार्य हैं। इनके आचरण से ही व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और संसार का सब तरह का कल्याण होता है।

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