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UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 4 भारतीय जनतन्त्रम् (गद्य – भारती) पाठ-सारांश   

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शासन-प्रणाली के भेद राजनीतिशास्त्र के विद्वानों ने शासन-प्रणाली के तीन भेद बताये हैं—

•राजतन्त्र में राजा का शासन होता है।

•कुलीनतन्त्र में कुलीन (विशिष्ट) लोगों का शासन होता है।

•जनतन्त्र में जनता का शासन होता है। भारतवर्ष में जनतन्त्र प्रणाली प्रचलित है।

प्रत्येक प्रकार के शासन को संक्षिप्त वर्णन निम्नवत् है—

(1) राजतन्त्र राजतन्त्र में व्यक्ति विशेष का शासन होता है और वह सर्वोच्च शासक राजा कहलाता है। वह जीवनपर्यन्त शासन करता है। उसकी मृत्यु के बाद उसका वरिष्ठ पुत्र या पुत्र के न रहने पर पुत्री सिंहासन पर बैठकर शासन करते हैं। राजतन्त्र के पक्षधर विद्वान् राजा को ईश्वरं का प्रतिनिधि मानकर उसके उचित या अनुचित आदेश का पालन करना अनिवार्य मानते हैं। प्राचीन काल में प्रजा को सन्तान के समान मानने वाले अनेक राजा हुए। वे दयालु, न्यायी और प्रजा के कल्याण के लिए राजकोष का व्यय करने वाले होते थे, परन्तु इसके विपरीत ऐसे भी राजा हुए, जो क्रूर, कृपण, प्रजा-पीड़क और अपने स्वार्थ के लिए राजकोष का व्यय करते थे; अत: लोगों के मन में राजतन्त्र के प्रति अरुचि उत्पन्न हो गयी।

(2) कुलीनतन्त्र कुलीन अथवा विशिष्ट लोगों का शासन भी प्रजा के लिए हितकर नहीं होता। समाज में धनी और बलवान ही विशिष्टजनों की श्रेणी में आते हैं। इनके शासन में इन्हीं वर्गों का हित सम्भव है। निर्धन और निर्बल लोग इनके शासन में अत्यन्त पीड़ित रहते हैं। इस शासन-प्रणाली में सामान्यजनों के कल्याण की कल्पना भी नहीं की जा सकती।।

(3) जनतन्त्र जनता के शासन को जनतन्त्र या प्रजातन्त्र कहते हैं। इसमें प्रभुत्वशक्ति जनता में निहित होती है। इस प्रणाली में जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि शासन करते हैं। जनता अपने मतों से अपना प्रतिनिधि स्वयं चुनती है। ये जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं। जो प्रतिनिधि जनता के विरुद्ध  आचरण करते हैं, वे जनता द्वारा पुनः निर्वाचित नहीं किये जाते। अतः इस शासन में जनहित के विपरीत कार्यों की सम्भावना नहीं रहती है। अधिकांश देशों में यही जनतन्त्र प्रणाली प्रचलित है।

अनेक प्रजातान्त्रिक देशों में अब भी राजा होते हैं, परन्तु वे जन-प्रतिनिधियों की सलाह से ही कार्य करते हैं। वहाँ भी प्रजातन्त्र जैसा ही शासन चलता है। राजा उन्हीं अधिकारों को उपभोग करता है, जो प्रतिनिधि उसे देते हैं।

जनतन्त्र का आविर्भाव जनतन्त्र प्रणाली का आविर्भाव सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में हुआ था, वहीं से वह अन्य देशों में भी फैली। प्राचीन भारत में गणतन्त्र शासन-प्रणाली के होने का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में गण शब्द तथा जैन और बौद्ध ग्रन्थों में गणराज्यों की चर्चा मिलती है। नीति-विशारद चाणक्य ने भी अपने ‘अर्थशास्त्र में गणराज्यों का उल्लेख किया है। गुप्तकाल में भारत में अनेक गणराज्य थे।

जनतन्त्र की विशेषता राजतन्त्र में लोग राजदण्ड के भय से ही कार्य करते थे, परन्तु जनतन्त्र में लोग कर्तव्य-भावना से प्रेरित होकर कार्य करते हैं। कर्तव्य करने के लिए सदा तत्पर रहने वाले परिश्रमी देशवासी नागरिक ही देश की उन्नति करने में समर्थ होते हैं। हमारा देश भारतवर्ष 15 अगस्त, सन् 1947 ई० को स्वतन्त्र हुआ था। विदेशी शासन में फैले हुए गरीबी, अशिक्षा, बीमारी आदि दोषों को दूर करता हुआ भारत सतत उन्नति के मार्ग पर अग्रसर है। भारत की उन्नति को देखकर विश्व के अन्य राष्ट्र दाँतों तले अँगुली दबा लेते हैं।

भारत के बालक-बालिकाएँ ही देश के स्वामी और सेवक हैं। वे जैसा आचरण करेंगे, देश का स्वरूप वैसा ही होगा; अत: उन्हें अनुशासित और सावधान रहकर, राष्ट्रहित के लिए स्वार्थ का त्याग करते हुए, राष्ट्र की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहकर देश की उन्नति करनी चाहिए।

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गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1)

जनतन्त्राभिधाना शासनप्रणाली अस्माकं देशे प्रवर्तमानाऽस्ति। राजनयशास्त्रज्ञैः विद्वद्भिः राजतन्त्रं कुलीनतन्त्रं प्रजातन्त्रमिति शासनप्रणाल्यास्त्रयो भेदाः प्रतिपादिताः। राजतन्त्रम्-राज्ञः शासनम् कुलीनतन्त्रम्-कुलीनानां विशिष्टजनानां शासनं, जनतन्त्रम्-जनानां शासनमिति तैराधुनिकैः व्याख्यातम्।

शब्दार्थ जनतन्त्राभिधाना = जनतन्त्र नाम वाली। अस्माकं = हमारे प्रवर्तमाना = प्रचलित, लागू राजनयशास्त्रज्ञैः = राजनीतिशास्त्र के विद्वानों के द्वारा प्रतिपादिताः = प्रतिपादित किये गये हैं। तैराधुनिकैः (तैः + आधुनिकैः) = उन आधुनिकों ने। व्याख्यातम् = व्याख्या की है।

सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के गद्य-खण्ड ‘गद्य-भारती’ में संकलित ‘भारतीय-जनतन्त्रम्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[संकेत इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में शासन-प्रणालियों के तीन भेद बताये गये हैं।

अनुवाद हमारे देश में जनतन्त्र’ नाम की शासन-प्रणाली प्रचलित है। राजनीतिशास्त्र को जानने वाले विद्वानों ने राजतन्त्र, कुलीनतन्त्र, प्रजातन्त्र—ये शासन-प्रणाली के तीन भेद बताये हैं। राजतन्त्र’ का अर्थ राजा का,शासन, ‘कुलीनतन्त्र’ का अर्थ कुलीन अर्थात् विशिष्ट लोगों का शासन, ‘जनतन्त्र’ का अर्थ जनता को शासन है; इस प्रकार सभी आधुनिक विद्वानों के द्वारा व्याख्या की गयी है।

(2)

राजतन्त्रम्-राजतन्त्रं व्यक्तिविशेषस्य शासनं भवति। स एव सर्वोच्चशासकः राजा भवति। यावज्जीवनं सः राजसिंहासने तिष्ठति शासनञ्च कुरुते। तस्य मृत्योः परं तस्य ज्येष्ठः पुत्रः, पुत्राभावे तस्य ज्येष्ठा पुत्री तत्पदमलङकुरुते। राजतन्त्रपक्षग्रहाः विपश्चितः राजानमीश्वरप्रतिनिधिभूतमेवाङ्गीकुर्वन्ति। तस्योचितोऽनुचितो वा आदेशः नोल्लङ्घनीयः इति तेषां मतम्।

शब्दार्थ सर्वोच्चशासकः = सबसे ऊपर शासन करने वाला। यावज्जीवनम् = समस्त जीवन, जीवनभर पुत्राभावे = पुत्र के अभाव में। तत्पदमलङकुरुते = उसके पद को सुशोभित करता है। राजतन्त्रपक्षग्रहाः = राजतन्त्र के पक्षधर। विपश्चितः = विद्वान्। राजानमीश्वरप्रतिनिधिभूतमेवाङ्गीकुर्वन्ति = राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि समझकर स्वीकार करते हैं। नोल्लङ्घनीयः = उल्लंघन करने योग्य नहीं।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में राजतन्त्र के विषय में बताया गया है।

अनुवाद राजतन्त्र–राजतन्त्र व्यक्ति विशेष का शासन होता है। वही सर्वोच्च शासक राजा होता है। वह जीवनपर्यन्त राज-सिंहासन पर बैठती है और शासन करता है। उसकी मृत्यु के बाद उसका सबसे बड़ा पुत्रे, पुत्र न होने पर उसकी सबसे बड़ी पुत्री उसके पद को सुशोभित करते हैं। राजतन्त्र का पक्ष लेने वाले विद्वान् राजा को ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में ही स्वीकार करते हैं। “उसका उचित या अनुचित आदेश उल्लंघन करने योग्य नहीं है, अर्थात् सर्वथा मान्य है, ऐसा उनका मत है।

(3)

पुरा बहवो राजानः प्रजां सन्ततिमिव मन्यमानाः शासनमकुर्वन यशोभागिनश्चाभूवन्। ते दयार्दहृदयाः न्यायरताः प्रजाकल्याणतत्पराः राज्यकोषस्य प्रजाहिताय प्रयोक्तारोऽभवन् परं बहवश्चेतरे क्रूाः, कृपणाः प्रजोत्पीडकाः राज्यकोषस्य स्वगर्हितमनोरथस्य पूर्तये व्ययशीलाः  स्वमनोवृत्तानुसारिणश्चासन्। एतादृशानां निरङकुशानां नृपतीनां शासने जनानां कीदृशी दशा स्यादिति सहज कल्पयितुं शक्यते। अतः शनैः शनैः कालेऽतीते राजतन्त्रं प्रति जनमानसेऽरुचिरुत्पन्ना।

शब्दार्थ सन्ततिमिव = सन्तान के समान। अभूवन् = होते थे। प्रयोक्तारः = प्रयोग करने वाले। अभवन् = हुए। बहवश्चेतरे (बहवः + च + इतरे) = और बहुत-से अन्य। प्रजोत्पीडकाः = प्रजा को पीड़ित करने वाले स्वगर्हितमनोरथस्य = अपने निन्दनीय मनोरथ की। स्वमनोवृत्तानुसारिणः = अपनी मनोवृत्ति के अनुसार चलने वाले। निरङ्कुशानां = अनियन्त्रितों का। स्यादिति = हो सकती है, यहा कालेऽतीते = समय बीतने पर। अरुचिः उत्पन्ना = अरुचि उत्पन्न हो गयी।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में बताया गया है कि जनता की राजतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली में कैसे अरुचि हुई।

अनुवाद प्राचीनकाल में बहुत-से राजा प्रजा को सन्तान के समान मानते हुए शासन करते थे और उनका यश फैला हुआ था। वे अत्यन्त दयालु, न्यायशील, प्रजा के कल्याण में तत्पर, राजकोष (खजाने) का प्रजा के हित के लिए प्रयोग करते थे, परन्तु बहुत-से दूसरे क्रूर, कंजूस, प्रजा को सताने वाले, राजकोष को अपने निन्दित मनोरथ की पूर्ति के लिए व्यय करने वाले और अपने मन के अनुसार आचरण करने वाले थे। इस प्रकार के निरंकुश राजाओं के शासन में लोगों की क्या दशा होगी, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। अतः धीरे-धीरे समय बीतने पर राजतन्त्र के प्रति लोगों के मन में अरुचि पैदा हो गयी।

(4)

कुलीनतन्त्रम्-कुलीनानां विशिष्टजनानां शासनमपि जनानां कृते श्रेयस्करं न सम्भाव्यते। समाजे विशिष्टजनाः बहुधा धनिनो बलिनो वा भवन्ति। धनिनां शासनं धनिनां कृते। बलवतां शासनं बलवतामेव कृते कल्याणकृत् सम्पत्स्यते। एवंविधे शासने निर्धनाः दुर्बलाश्च भृशमुत्पीडिता भवेयुर्नात्र संशयलेशः। तन्त्रेऽस्मिन् सामान्यजनानां कल्याणस्य कल्पनाऽपि खपुष्पमिव भवेत्। अतएवेदं तन्त्रं कदापि जनहृदि हृद्यं पदं नाऽलभत्।

शब्दार्थ कुलीनतन्त्रम् = विशिष्ट लोगों का शासन। विशिष्टजनानां = विशिष्ट मनुष्यों का। श्रेयस्करम् = लाभकारी, कल्याणकारी। न सम्भाव्यते = नहीं सम्भव होता है। बलिनः = बलशाली। कल्याणकृत् = कल्याण करने वाला। सम्पत्स्यते = होगा। भृशम् = अत्यधिक संशयलेशः = जरा भी संशय। खपुष्पमिव = आकाश-कुसुम के समान अर्थात् असम्भव हृद्यम् = हृदय को आनन्दित करने वाला। नाऽलभत् = नहीं प्राप्त किया।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में कुलीनतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली का वर्णन किया गया है।

अनुवद्ध कलीनतन्त्र-कुलीनों विशिष्टजनों का शासन भी लोगों के लिए कल्याणकारी सम्भव नहीं हो सकता है। समाज में विशेष लोग प्रायः धनी या बलवान् होते हैं। धनिकों का शासन धनियों के लिए, बलवानों का शासन बलवान् लोगों के लिए कल्याणकारी होगा। इस प्रकार के शासन में निर्धन और कमजोर अत्यधिक सताये जाते रहेंगे, इसमें थोड़ा भी सन्देह नहीं है। इस शासन में सामान्य लोगों के कल्याण की कर पना भी आकाश के फूल के समान अर्थात् असम्भव हो जाएगी। अतएव इस शासन ने कभी भी लोगों के हृदय में अच्छा स्थान प्राप्त नहीं किया।

(5)

जनतन्त्रम्-जनानां तन्त्रं जनानां शासनं जनतन्त्रं प्रजातन्त्रं वोच्यते। अस्मिन् तन्त्रे राज्ञः स्थानं जनाः गृह्णन्ति। राजतन्त्रे राजनि स्थिता प्रभुत्वशक्तिः जनतन्त्रे जनेषु सन्निहिता जायते। अतोऽस्यां पद्धतौ न कश्चिज्जनः शासकोऽपितु जनैः निर्वाचिताः प्रतिनिधयः शासनकार्यं कुर्वते। जनाः स्वप्रतिनिधीन् भारते पञ्चवर्षेभ्यश्चिन्वन्ति। निर्वाचनप्रसङ्ग न कश्चिच्छ्रेष्ठः, न वा कश्चिद्धीनः, न च बलवान्, न वा दुर्बलः विगण्यते। जातिधर्मवर्णलिङ्गनिर्विशेषाः सर्वे जनाः अष्टादशवर्षवयस्काः नराः नार्यश्च निर्वाचने

मताधिकृताः सन्ति। सर्वेषां मतमूल्यं तुल्यमेव भवति। एवंविधाः जननिर्वाचिताः प्रतिनिधयः जनताम्प्रत्येवोत्तरदायिनो भवन्ति। अतः ये प्रतिनिधयः जनविरोधिकार्यं कुर्वन्ति जनमतविरुद्धाचरणं वाऽऽचरन्ति ते पुनर्निर्वाचने साफल्यं न लभन्ते। एतदेव जनभयं तेषां पथच्युतिं रुणद्धि। निर्वाचनात्प्रागपि क्रियमाणजनहितविरुद्धकार्याणां विरोधाय जनाः संविधानप्रदत्तैरधिकारैः शासनं विरुन्धन्ति। शासनकार्ये रताः प्रतिनिधयस्तदा तथाविधस्य विचारस्य नीतेर्वा परित्यागाय परिवर्तनाय वा विवशाः सजायन्ते। अतएवास्यां शासनसरण्यां जनहितविपरीतनीतेः कार्यस्य च सम्भावनाऽल्पीयसी वर्तते इति सर्वेषां मतम्। स्ववैशिष्ट्यैः जनतन्त्रमिदानीं जगति सर्वेषामितरतन्त्राणां मूर्धानमधिशेते।।

शब्दार्थ उच्यते = कहा जाता है। गृह्णन्ति = ग्रहण करते हैं। प्रभुत्वशक्तिः = सर्वोच्च राजत्व शक्ति, सत्ताधिकार सन्निहिता = स्थित, छिपी हुई, रखी हुई। पञ्चवर्षेभ्यः = पाँच वर्षों के लिए। चिन्वन्ति = चुनते हैं। निर्वाचनप्रसङ्गे = चुनाव के समय। कश्चिच्छेष्ठः = कोई श्रेष्ठ कश्चित् हीनः = कोई हीना विगण्यते = गिना जाता है। जातिधर्मवर्णलिङ्गनिर्विशेषाः = जाति, धर्म, वर्ण, लिंग आदि से रहित। अष्टादशवर्षवयस्कोः = अठारह वर्ष की आयु वाले। मताधिकृताः = मत के अधिकारी जनताम्प्रत्येवोत्तरदायिनः (जनताम् + प्रति + एव + उत्तरदायिनः) = जनता के प्रति ही उत्तरदायी। साफल्य = सफलता को। पथच्युतिम् = पथभ्रष्ट होने को। रुणद्धि = रोकता है। प्रागपि = पहले-भी। विरुन्धन्ति = रोकते हैं, विरोध करते हैं। सञ्जायन्ते = हो जाते हैं। अल्पीयसी = बहुत कम| स्ववैशिष्ट्यैः = अपनी विशेषताओं से। इतरतन्त्रणां = दूसरे तन्त्रों का। मूर्धानमधिशेते = शीश पर सोता है, अर्थात् श्रेष्ठ है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में जनतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली की अच्छाइयों का वर्णन किया गया है।

अनुवाद जनतन्त्र–जनता के शासन को जनतन्त्र या प्रजातन्त्र कहा जाता है। इस शासन में राजा के स्थान को जनता ले लेती है। राजतन्त्र में राजा में स्थित प्रभुत्वशक्ति, जनतन्त्र में लोगों में स्थित हो जाती है। अत: इस प्रणाली में कोई व्यक्ति शासक नहीं होता है, अपितु जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधि शासन का कार्य करते हैं। भारत में लोग पाँच वर्ष के लिए अपने प्रतिनिधि चुनते हैं। निर्वाचन के सम्बन्ध में कोई बड़ा या छोटा नहीं होता है, न कोई बलवान् अथवा न कोई दुर्बल समझा जाता है। जाति, धर्म, वर्ण, लिंग के अन्तर के बिना सभी अठारह वर्ष के स्त्री या पुरुष चुनाव में मत के अधिकारी होते हैं। सबके मत का मूल्य समान ही होता है। इस प्रकार से जनता के द्वारा चुने गये प्रतिनिधि जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं। अतः जो प्रतिनिधि जन-विरोधी कार्य करते हैं अथवा जनमत के विरुद्ध आचरण करते हैं, वे पुनः चुनाव में सफलता प्राप्त नहीं करते हैं। लोगों का यही भय उनको पथभ्रष्ट होने से रोकता है। चुनाव से पूर्व भी किये गये जनहित के विरुद्ध कार्यों के विरोध के लिए लोग संविधान के द्वारा दिये गये अधिकारों से शासन का विरोध करते हैं। सब लोगों का ऐसा मत है कि शासन के कार्य में लगे हुए प्रतिनिधि तब उस प्रकार के विचार अथवा नीति को त्यागने के लिए या बदलने के लिए विवश हो जाते हैं। इसलिए इस शासन-प्रणाली में जनहित के विपरीत नीति और कार्य की सम्भावना बहुत कम रह जाती है, यह सभी का मत है। अपनी विशेषताओं से जनतन्त्र इस समय संसार में सब दूसरे शासनों में श्रेष्ठ है।

(6)

अनेकेषु प्रजातन्त्रीयेषु देशेष्वधुनाऽपि राजानः सन्ति, किन्तु ते तत्रालङ्कारमात्रभूताः जनप्रतिनिधिभिः नियमिताधिकाराः वर्तन्ते। सत्स्वपि राजसु तत्रापि च प्रजातन्त्ररीत्या एव शासन सञ्चरते। तत्रापि शासनस्य सर्वेऽधिकाराः जननिर्वाचितप्रतिनिधिसदसि सन्निहितास्तिष्ठन्ति। ते. एवाधिकारा राज्ञोपभुज्यन्ते ये प्रतिनिधिभिः तस्मै प्रदत्ताः।

शब्दार्थ अधुनापि = आज भी। अलङ्कारमात्रभूताः = मात्र अलंकार स्वरूप। नियमिताधिकाराः = निर्धारित अधिकारों वाले। सञ्चरते = चलता है। सदसि = सदन में या सभा में। सन्निहिताः = निहित। राज्ञोपभुज्यन्ते = राजा के द्वारा भोगे जाते हैं।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में बताया गया है कि अनेक प्रजातान्त्रिक देशों में राजा जनता का ही प्रतिनिधि होता है।

अनुवाद आज भी अनेक प्रजातन्त्र प्रणाली वाले देशों में राजा हैं, किन्तु वे वहाँ की शोभास्वरूप हैं, उनके अधिकार जन-प्रतिनिधियों द्वारा नियमित या निर्धारित हैं। राजाओं के रहने पर भी वहाँ भी प्रजातन्त्र की रीति से ही शासन चलता है। वहाँ भी शासन के सभी अधिकार जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि सभा में निहित हैं। राजा उन्हीं अधिकारों का उपभोग करता है, जो प्रतिनिधियों ने उसे दिये हैं।

(7) जनतन्त्रशासनप्रणाल्याः आविर्भावादिविषये सुनिश्चिततरमिदं यदस्याः जन्म इङ्ग्लैण्डदेशेऽभवत्। तस्मादेवदेशादेषाऽन्येदेशेषु प्रसृता तत्र तत्र देशेषु च प्रचलिता वर्तते।।

प्राचीनभारते गणतन्त्राभिधाना शासनपद्धतिः राजतन्त्रभिन्ना प्रचलिताऽभूदितीतिहासग्रन्थेषु तथाविधोल्लेखो दरीदृश्यते। विश्वस्य सर्वातिशायिप्राचीनग्रन्थे ऋग्वेदे ‘गण’ शब्दस्य बहुबारं प्रयोगो विहितः। जैनग्रन्थेषु बौद्धग्रन्थेषु गणाधीनराज्यानां चर्चा समुपलभ्यते। इतरेतरराज्यनामभिः विभक्तां भारतभुवमेकसूत्रे आबद्धं बद्धपरिकरो, राजनयविचक्षणो विलक्षण आचार्यः कौटिल्यः स्वरचिते अर्थशास्त्राभिधाने ग्रन्थे गणराज्यानामुल्लेखं कृतवान्। गुप्तकालिकेतिहासे हिमगिरिविन्ध्ययोर्मध्येऽनेकेषां गणराज्यानामुपवर्णनं कृतमितिहासज्ञैः। यत्र तत्र प्रयुक्तो गणशब्दः बहुसङ्ख्यकान् जनानेव बोधयति। अनेन प्राचीनभारते राजतन्त्रेतरा शासनप्रणाली गणतन्त्ररूपा प्रचलिता आसीदिति सिद्ध्यति।

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प्राचीनभारते गणतन्त्रा …………………………………. कृतमिति इतिहासज्ञैः।

शब्दार्थ आविर्भावादिविषये = उत्पत्ति आदि के विषय में। प्रसृता = फैली। गणतन्त्राभिधाना= गणतन्त्र नाम की। राजतन्त्रभिन्ना = राजतन्त्र से भिन्न। तथाविधोल्लेखः = उस प्रकार की विधा का उल्लेख। दरीदृश्यते = प्रायः देखा जाता है। विहितः = किया गया है। समुपलभ्यते = प्राप्त होती है, मिलती है। इतरेतर = भिन्न-भिन्न। बद्धपरिकरः = दृढ़ता से तैयार। राजनय-विचक्षणः = राजनीति में कुशल। हिमगिरिविन्ध्ययोर्मध्येऽनेकेषाम् = हिमालय और विन्ध्याचल के बीच में अनेक का। बोधयति = बताता है। राजतन्त्रेतरा = राजतन्त्र से भिन्न| आसीदिति (आसीद् + इति) = थी, ऐसा। सिद्ध्यति = सिद्ध होता है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में जनतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली के आविर्भाव और प्राचीन भारत में इसके प्रचलन के विषय में बताया गया है।

अनुवाद जनतन्त्र शासन-प्रणाली की उत्पत्ति के मत के विषय में यह निश्चित मत है कि इसका जन्म इंग्लैण्ड देश में हुआ था। उसी देश से ही अन्य देशों में फैली हुई यह उन-उन देशों में प्रचलित है। इतिहास के ग्रन्थों में प्रायः इस प्रकार का उल्लेख दिखाई पड़ता है कि प्राचीन भारत में राजतन्त्र से भिन्न ‘गणतन्त्र’ नाम की शासन-प्रणाली प्रचलित थी। विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में ‘गण’ शब्द का बहुत बार प्रयोग किया गया है। जैन और बौद्ध ग्रन्थों में ‘गण’ के अधीन राज्यों की चर्चा प्राप्त होती है। दूसरे-दूसरे अलग-अलग राज्य के नामों से विभक्त भारत-भूमि को एक सूत्र में बाँधने के लिए दृढ़ता से तैयार राजनीति में कुशल आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) ने स्वरचित ‘अर्थशास्त्र’ नाम के ग्रन्थ में गणराज्यों का उल्लेख किया है। गुप्तकाल के इतिहास में इतिहास के जानकारों ने हिमालय और विन्ध्याचल के मध्य में अनेक गणराज्यों का वर्णन किया है। जहाँ-तहाँ प्रयोग किया गया ‘गण’ शब्द बहुत अधिक मनुष्यों को ही ज्ञान कराता है। इससे प्राचीन भारत में राजतन्त्र से भिन्न शासन-प्रणाली ‘गणतन्त्र’ के रूप में प्रचलित थी, ऐसा सिद्ध होता है।

(8) राजतन्त्रे दण्डभयाद् कार्यं निष्पादयन्ति जनाः। जनतन्त्रे स्वत एव कर्तव्यभावनया स्वकार्दै निष्पादनीयं भवेत्। कर्तव्यबोधः एव जनतन्त्रस्य मूलाधारः। यस्मिन् कस्मिन् वा कार्ये नियुक्ताः कर्तव्यसम्पादनसमुत्सुकाः सततं राष्ट्रविकासनिरताः विहितसाध्यं साधयन्तोऽन्ताः श्रमशीला देशवासिनो मगरिका एव स्वराष्ट्रमुन्नेतुं क्षमन्ते इति जनतन्त्रपद्धत्याः महद्वैशिष्ट्यम्।

राजतन्त्रे दण्डभयाद् …………………………………. उन्नेतुं क्षमन्ते।

शब्दार्थ दण्डभयाद् = दण्ड के भय से। निष्पादयन्ति = सम्पन्न करते हैं। स्वत एव = स्वयं ही। कर्त्तव्यबोधः = कर्तव्य का ज्ञान। मूलाधारः = मूल आधार। कर्त्तव्यसम्पादनसमुत्सुकाः = कर्तव्य पूरा करने के लिए अधिक उत्सुक। निरताः = लगे हुए। विहितसाध्यम् = इच्छित कार्य को। साधयन्तः = सिद्ध करते हुए। अश्रान्ताः = थकावटरहित, उत्साहसम्पन्न| उन्नेतुम् = उन्नति करने के लिए। क्षमन्ते = सफल होते हैं। महवैशिष्ट्यम् = महान् विशेषता।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में जनतन्त्र प्रणाली की विशेषता बतायी गयी है।

अनुवाद राजतन्त्र में लोग दण्ड के भय से कार्य सम्पन्न करते हैं। जनतन्त्र में स्वयं ही कर्त्तव्य की भावना से अपना काम करने योग्य होता है। कर्तव्य का ज्ञान ही जनतन्त्र का मूल आधार है। जनतन्त्र प्रणाली की यह महान् विशेषता है कि जिस किसी भी कार्य में लगाये गये, देशवासी नागरिक ही अपने कर्तव्य को पूरा करते हुए उत्साहित, लगातार राष्ट्र के विकास में लगे हुए, इच्छित कार्य को पूरा करते हुए, उत्साहयुक्त, परिश्रमी और राष्ट्र की उन्नति करने में समर्थ होते हैं।

(9) अस्माकं देशो भारतवर्षमपि सप्तचत्वारिंशदुत्तरैकोनविंशतिशततमे खीष्टाब्दे अगस्तमासस्य पञ्चदशदिनाङ्के वैदेशिकक्रूरकरान्मुक्तं सत् जनतन्त्रप्रणालीमूरीचकार। विदेशीयशासनजनितान् दारिद्रयाशिक्षाऽऽमयादिदोषान् अपाकुर्वन् सततं विकासोन्मुखोऽस्माकं देशस्त्वरितगत्याऽग्रेसरन्नस्ति। साश्चर्यमेतस्योन्नतिं विश्वराष्ट्राणि पश्यन्ति। देशवासिनां देशप्रेम्णः परिणामोऽयं विद्यते।।

अस्माकं देशो …………………………………. अग्रेसरन्नस्ति

शब्दार्थ सप्तचत्वारिंशदुत्तरैकोनविंशतशतमे = उन्नीस सौ सैंतालीस में। ख्रीष्टाब्दे = ईस्वी में। वैदेशिकक्रूरकरान्मुक्तम् (वैदेशिक + क्रूरकरात् + मुक्तम्) = विदेशियों के कठोर हाथों से छूटा हुआ। ऊरीचकार = स्वीकार किया। आमयादिदोषान् = बीमारी आदि दोषों को। अपाकुर्वन् = दूर करते हुए। त्वरितगत्या = तीव्र गति से। अग्रेसरन्नस्ति = आगे बढ़ रहा है।

प्रसंग प्रस्तु गद्यांश में वर्तमान जनतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली द्वारा भारत की उन्नति का वर्णन किया गया है।

अनुवाद हमारे देश भारतवर्ष ने भी सन् 1947 ईस्वी में अगस्त मास की 15 तारीख को विदेशियों के क्रूर हाथों से मुक्त होते हुए जनतन्त्र प्रणाली को स्वीकार किया। विदेशी शासन के कारण उत्पन्न हुई गरीबी, अशिक्षा, बीमारी आदि दोषों को दूर करता हुआ निरन्तर विकास के लिए उन्मुख हमारा देश तीव्रगति से आगे बढ़ रहा है। संसार के राष्ट्र इसकी उन्नति को आश्चर्यपूर्वक देख रहे हैं। यह देशवासियों के देशप्रेम का परिणाम है।

(10) यूयमेव बालकबालिकाश्चास्य राष्ट्रस्य स्वामिनः सेवकाश्च स्थ। यूयं यथा समाचरिष्यथ तथैव राष्ट्ररूपं भविष्यति। यदि यूयं स्वकर्तव्यानि सदा सावधाना अनुशासिताः सम्पादयन्तः राष्ट्रहिताय स्वहितं परिहरन्तः राष्ट्ररक्षायै राष्ट्रविकासाय तत्पराः स्थास्यथ तदैवास्माकं राष्ट्र भारतवर्षं जगद्गुरुगौरवपदं पुनरुपलप्स्यते।।

शब्दार्थ समाचरिष्यथ = आचरण करोगे। स्वकर्तव्यानि = अपने कर्तव्य सम्पादयन्तः = सम्पन्न करते हुए। परिहरन्तः = त्यागते हुए। तत्पराः स्थास्यथ = तत्पर रहोगे। जगद्गुरुगौरवपदम् = संसार के गुरु होने का • गौरवशाली पद। उपलप्स्यते = प्राप्त करेगा।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में देशवासी बालक-बालिकाओं को राष्ट्र की उन्नति करने के लिए सम्बोधित किया गया है।

अनुवाद बालक-बालिकाओ! तुम सभी राष्ट्र के स्वामी और सेवक हो। तुम सब जैसा आचरण करोगे, वैसा ही राष्ट्र का स्वरूप होगा। यदि तुम लोग सदा सावधान और अनुशासित रहकर अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए, राष्ट्रहित के लिए अपने हितों का त्याग करते हुए राष्ट्र की रक्षा हेतु राष्ट्र के विकास के लिए तैयार रहोगे, तभी हमारा राष्ट्र भारतवर्ष संसार के गुरु होने के गौरवपूर्ण पद को पुनः प्राप्त कर सकेगा।

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