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UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 6 कार्यं वा साधयेयं देहं वा पातयेयम् (गद्य – भारती)  पाठ-सारांश

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रघुवीर सिंह का परिचय रघुवीर सिंह शिवाजी का एक विश्वासपात्रे सेवक है। उसकी आयु मात्र सोलहवर्ष की है। वह शिवाजी का एक आवश्यक और गोपनीय पत्र लेकर सिंह दुर्ग से तोरण दुर्ग की ओर जा रहा है।

गमन-समय एवं वेशभूषा आषाढ़ मास में सायं समय सूर्य अस्त होने ही वाला था। पक्षी अपने घोंसलों में लौट रहे थे। अचानक आकाश में बादल छा गये। उस समय गौर वर्ण के शरीर वाला युवक, शिवाजी का विश्वासपात्र अनुचर रघुवीर सिंह उनका आवश्यक पत्र लेकर सिंह दुर्ग से घोड़े पर तोरण दुर्ग जा रहा था। उसका सुगठित शरीर गौर वर्ण का था और बाल बुंघराले काले थे। वह प्रसन्नमुख, हरा कुर्ता और हरी पगड़ी पहने हुए चला जा रहा था।

मौसम का प्रतिकूल होना उसी समय,अचानक तेज वर्षा और आँधी आयी। काले बादलों से शाम के समय में अन्धकार दुगुना हो गया। धूल और पत्ते उड़ रहे थे जिससे रघुवीर सिंह को पर्वतों, वनों, ऊँचे शिखरों, झरनों का मार्ग सूझ नहीं रहा था। वर्षा के कारण हुई चिकनी चट्टानों पर उसका घोड़ा क्षण-प्रतिक्षण फिसल जाता था। वृक्षों की शाखाओं से बार-बार ताड़ित होता हुआ भी दृढ़ संकल्पी वह घुड़सवार अपने काम से विमुख नहीं हो रहा था।

कर्तव्य-परायणता कभी रघुवीर सिंह का घोड़ा डरकर दोनों पैरों पर खड़ा हो जाता था, कभी पीछे लौट पड़ता था और कभी कूद-कूदकर दौड़ने लगता था, परन्तु यह वीर लगाम हाथ में पकड़े, घोड़े के कन्धों और गर्दन को हाथ से थपथपाता हुआ आगे बढ़ता ही चला जा रहा था। एक ओर आँखों में चकाचौंध पैदा करने वाली दर्शकों के मनों को कम्पित करती हुई, आकाश को चीरती हुई बिजली चमक रही थी तो दूसरी ओर सैकड़ों तोपों की गर्जना के समान घोर शब्द जंगल में पूँज रहा था, परन्तु “या तो कार्य पूरा करके रहूँगा या मर मिटूगा यह दृढ़-संकल्प मन में लिये हुए वह अपने कार्य से लौट नहीं रहा था।

अपने स्वामी से प्रेरित जिसका स्वामी परिश्रमी, अद्भुत साहसी, विपत्तियों में धैर्यशाली और दृढ़-संकल्पी हो, उसका विश्वासपात्र सेवक फिर वैसा परिश्रमी, साहसी, वीर और दृढ़-संकल्पी क्यों न हो? वह आँधी-तूफान, तेज वर्षा और भयानक वातावरण से डरकर अपने स्वामी के कार्य की कैसे उपेक्षा कर सकता है? यह सोचता हुआ तथा घोड़े को तेज दौड़ाता हुआ वह आगे बढ़ता ही चला जा रहा था।

गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1)

शिववीरस्य कोऽपि सेवकः श्रीरघुवीरसिंहः तस्यावश्यकं पत्रञ्चादाय महताक्लेशेन सिंहदुर्गात् तोरणदुर्गं प्रयाति। मासोऽयमाषाढस्यास्ति समयश्च सायम्। अस्तं जिगमिषुर्भगवान् भास्करः, सिन्दूर-द्रव-स्नातानामिव वरुणदिगवलम्बिनामरुण-वारिवाहानामभ्यन्तरं प्रविष्टः। कलविङ्काः नीडेषु प्रतिनिवर्तन्ते। वनानि प्रतिक्षणमधिकाधिक श्यामतां कलयन्ति। अथाकस्मात् परितो मेघमाला पर्वतश्रेणिरिव प्रादुर्भूय समस्तं गगनतलं प्रावृणोत्।।

शब्दार्थ शिववीरस्य = वीर शिवाजी का! कोऽपि = कोई। महताक्लेशेन = अत्यधिक कष्ट से। प्रयाति = जा रहा है। जिगमिषुः = जाने की इच्छा करने वाला। वरुणदिक् = पश्चिम दिशा। अवलम्बिनाम् = अवलम्ब लेने वालों के समान वारिवाहानाम् = बादलों के अभ्यन्तरम् = भीतर। कलविङ्काः = गौरैया नाम के पक्षी। नीडेषु = घोंसलों में। प्रतिनिवर्तन्ते = लौटते हैं। कलयन्ति = धारण करते हैं। अथाकस्मात् = इसके बाद सहसा। परितः = चारों ओर से प्रादुर्भूय = उत्पन्न होकर प्रावृणोत् = ढक लिया।

सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के गद्य-खण्ड ‘गद्य-भारती’ में संकलित ‘कार्यं वा साधयेयं देहं वा पातयेयम्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[संकेत इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में उस समय का रोचक वर्णन किया गया है, जब शिवाजी का विश्वासपात्र अनुचर उनका गोपनीय पत्र लेकर सन्ध्या के समय सिंह दुर्ग से तोरण दुर्ग की ओर जा रहा है।

अनुवाद वीर शिवाजी का कोई सेवक श्री रघुवीर सिंह उनका आवश्यक पत्र लेकर अत्यन्त कष्ट से सिंह दुर्ग से तोरण दुर्ग को जा रहा है। यह आषाढ़ का महीना और सायं का समय है। अस्ताचल की ओर जाने को इच्छुक भगवान् सूर्य सिन्दूर के घोल में स्नान किये हुए के समान, पश्चिम दिशा में छाये हुए लाल बादलों के अन्दर प्रविष्ट हो गये। गौरैया नामक पक्षी घोंसलों में लौट रहे हैं। वन प्रत्येक क्षण अधिकाधिक कालिमा को धारण कर रहे हैं। इसके बाद सामने अचानक मेघमालाओं ने पर्वतमाला की भाँति उमड़कर सारे आकाश को चारों ओर से घेर लिया।

(2)

अस्मिन् समये एकः षोडशवर्षदेशीयो गौरो युवा हयेन पर्वतश्रेणीरुपर्युपरि गच्छति स्म। एष सुघटित-दृढ-शरीरः, श्यामश्यामैर्गुच्छगुच्छैः कुञ्चित-कुञ्चितैः कचकलापैः कमनीयकपोलपालिः, दूरागमनायास-वशेन-स्वेदबिन्दु-व्रजेन समाच्छादित-ललाट-कपोल-नासाग्रोत्तरोष्ठः, प्रसन्नवदनाम्भोजः, हरितोष्णीषशोभितः, हरितेनैव च कञ्चुकेन प्रकटीकृत-व्यूढ-गूढचरता-कार्यः, कोऽपि शिववीरस्य विश्वासपात्रं, सिंहदुर्गात् तस्यैव पत्रमादाय, तोरणदुर्गं प्रयाति स्म।

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शब्दार्थ षोडशवर्षदेशीयः = सोलह वर्ष का हयेन = घोड़े के द्वारा कुञ्चित-कुञ्चितैः कचकलापैः = धुंघराले बालों के समूह से। कमनीयकपोलपालिः = सुन्दर गालों वाला। दूरागमनायास-वशेन = दूर से परिश्रम के साथ आने के कारण। स्वेदबिन्दुव्रजेन = पसीने की बूंदों के समूह से। समाच्छादित  = ढक गया है। ललाटकपोलनासाग्रोत्तरोष्ठः = मस्तक, गाल, नाक का अग्रभाग और ऊपर का होंठ। प्रसन्नवदनाम्भोजः = प्रसन्न है मुखरूपी कमल जिसका। हरितोष्णीष = हरी पगड़ी। कञ्चुकेन = लम्बा कुर्ता प्रकटीकृतव्यूढ-गूढचरता-कार्यः = प्रकट हो रहा है गुप्तचर का विशेष कार्य जिसका। तस्यैव = उसका ही। प्रयाति स्म = जा रहा था।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में शिवाजी के विश्वासपात्र अनुचर रघुवीर सिंह के बाह्य व्यक्तित्व का वर्णन किया गया है।

अनुवाद इस समय एक सोलह वर्ष की उम्र को गौरवर्ण युवक घोड़े से पर्वतश्रेणियों के ऊपर-ऊपर जा रहा था। यह सुगठित और पुष्ट शरीर वाला, अत्यन्त काले गुच्छेदार घंघराल बालों के समूह से शोभित कपोलों वाला, दूर चलने की थकावट के कारण पसीन की बूंदों के समूह से आच्छादित मस्तक, कपोल, नाक और होंठ वाला, प्रसन्न मुख-कमल वाला, हरी पगड़ी से शोभित और हरे कुर्ते से गुप्तचर के कठिन कार्य को प्रकट करने वाला, वीर शिवाजी का कोई विश्वासपात्र सेवक सिंह दुर्ग से उन्हीं (शिवाजी) का पत्र लेकर तोरण दुर्ग की ओर जा रहा था।

(3)

तावदकस्मादुत्थितो महान् झञ्झावातः एकः सायं समयप्रयुक्तः स्वभाववृत्तोऽन्धकारः स च द्विगुणितो मेघमालाभिः। झञ्झावातोदधूतैः रेणुभिः शीर्षपत्रैः कुसुमपरागैः शुष्कपुष्पैश्च पुनरेष द्वैगुण्यं प्राप्तः। इह पर्वतश्रेणीतः पर्वतश्रेणीः, वनाद वनानि, शिखराच्छिखराणि प्रपातात् प्रपातान्, अधित्यकातोऽधित्यकाः, उपत्यकातः उपत्यकाः, न कोऽपि सरलो मार्गः, पन्था अपि नावलोक्यते, क्षणे क्षणे हयस्य खुराश्चिक्कणपाषाणखण्डेषु प्रस्खलन्ति, पदे पदे दोधूयमानाः वृक्षशाखाः सम्मुखमाघ्नन्ति, परं दृढ़-सङ्कल्पोऽयं सादी न स्वकार्याद विरमति।

शब्दार्थ तावदकस्मादुत्थितः = तब तक सहसा उठा। झञ्झावातः = वर्षासहित तूफान। स्वभाववृत्तोऽन्धकारः = अपने आप फैला हुआ अन्धकार। द्विगुणितः = दो गुना। झञ्झावातोधूतैः = आँधी से उठी हुई। शीर्णपत्रैः = टूटे पत्तों से। द्वैगुण्यं प्राप्तः = दोगुनेपन को प्राप्त हो गया। शिखराच्छिखराणि = पर्वत की चोटी से चोटियों तक प्रपातात् = झरने से। अधित्यकाः = पर्वत का ऊपरी भाग। उपत्यका = पर्वत का निचला भाग, तलहटी। नावलोक्यते = नहीं दिखाई देता है। हयस्य = घोड़े के। चिक्कणपाषाणखण्डेषु = चिकने पत्थर के टुकड़ों पर प्रस्खलन्ति = फिसलते हैं। दोधूयमानाः = हिलते हुए। आघ्नन्ति = चोट करती हैं। सादी = घुड़सवार। न विरमति = नहीं रुकता है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में तोरण दुर्ग की ओर जाते हुए शिवाजी के अनुचर के मार्ग की कठिनाइयों का वर्णन रोचकता के साथ किया गया है।

अनुवाद उसी समय अचानक बड़ी तेज वर्षासहित आँधी उठी। एक तो शाम का समय होने से स्वाभाविक रूप से अन्धकार घिरा हुआ था और वह मेघमालाओं से दुगुना हो गया था। वर्षासहित तेज तूफान से उड़ी हुई धूल से, टूटे हुए पत्तों से, फूलों के पराग से और सूखे फूलों  से पुन: यह दुगुना हो गया था। यहाँ एक पर्वतश्रेणी से पर्वतमालाओं तक, वन से वनों तक, चोटी से चोटियों तक, झरने से झरनों तक, पहाड़ के ऊपर की समतल भूमि से दूसरे पहाड़ के ऊपर की समतल भूमि तक, तलहटी से तलहटियों तक जाने का कोई भी सीधा रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है। क्षण-क्षण पर घोड़े के खुर चिकने पत्थर के टुकड़ों पर फिसल रहे हैं। कदम-कदम पर तेज हिलते हुए वृक्षों की शाखाएँ सामने से लगकर चोट कर रही हैं, परन्तु दृढ़ संकल्प वाला यह घुड़सवार अपने कार्य से नहीं रुक रहा है।

(4)

कदाचित् किञ्चिद् भीत इव घोटकः पादाभ्यामुत्तिष्ठति, कदाचिच्चलन्नकस्मात् परिवर्तते, कदाचिदुत्प्लुत्य च गच्छति। परमेष वीरो वल्गां सम्भालयन्, मध्ये-मध्ये सैन्धवस्य स्कन्धौ कन्धराञ्च करतलेनऽऽस्फोटयन्, चुचुत्कारेण सान्त्वयंश्च न स्वकार्याद विरमति। यावदेकस्यां दिशि नयने विक्षिपन्ती, कर्णो स्फोटयन्ती, अवलोचकान् कम्पयन्ती, वन्यस्त्रासयन्ती, गगनं कर्त्तयन्ती, मेघान् सौवर्णकषयेवघ्नन्ती, अन्धकारमग्निना दहन्ती इव चपला चमत्करोति, तावदन्यस्यामपि दिशि ज्वालाजालेन बलाहकानावृणोति, स्फुरणोत्तरं स्फुरणं गज्र्जनोत्तरं गज्र्जनमिति परः शतः-शतघ्नी-प्रचारजन्येनेव, महाशब्देन पर्यपूर्यत साऽरण्यानी। परमधुनाऽपि “कार्यं वा साधयेयं देहं वा पातयेयम्” इति कृतप्रतिज्ञोऽसौ शिववीर-चरो न निजकार्यान्निवर्तते।

शब्दार्थ कदाचित् = कभी। किञ्चित् = कुछ। घोटकः = घोड़ा। पादाभ्यामुत्तिष्ठति = दो पैरों पर उठ जाता है। कदाचिच्चलन्नकस्मात् = कभी चलता हुआ सहसा परिवर्त्तते = लौट जाता है। उत्प्लुत्य = कूदकर। वल्गाम् = लगाम को। सम्भालयन् = सँभालता हुआ। सैन्धवस्य = घोड़े के। स्कन्ध = दोनों कन्धों को। कन्धराम् = गर्दन को। आस्फोटयन् = थपथपाता हुआ। चुचुत्कारेण = पुचकार से। यावदेकस्याम् = जब तक एक में विक्षिपन्ती = चौंधियाती हुई। अवलोचकान् = दर्शकों को त्रासयन्ती = भयभीत करती हुई। कर्त्तयन्ती = चीरती हुई। सौवर्णकषया = सोने की चाबुक से। घ्नन्ती = मारती हुई। बलाहकान् = बादलों को। आवृणोति = ढक लेती है।  स्फुरणोत्तरम् = चमकने के बाद। परः शतः = सैकड़ों से भी अधिक शतघ्नी = तोपें। पर्यपूरत = भर गयीं, पूर्ण हो गयीं। अरण्यानी = वन। साधयेयम् = सिद्ध करूँगा। पातयेयम् = गिरा दूंगा। कृतप्रतिज्ञोऽसौ = प्रतिज्ञा करने वाला यह। चरः = गुप्तचर।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में शिवाजी के अनुचर के मार्ग में आयी हुई कठिनाइयों का वर्णन मनोरम शैली में किया गया है।

अनुवाद कभी कुछ डरे हुए के समान घोड़ा (अगले) दोनों पैरों को उठा लेता है, कभी चलता हुआ अचानक लौट पड़ता है और कभी कूद-कूदकर चलता है, परन्तु वह वीर लगाम को पकड़े हुए बीच-बीच में घोड़े के दोनों कन्धों और गर्दन को हाथ से थपथपाता हुआ, पुचकार से सान्त्वना देता हुआ अपने कार्य से नहीं रुकता है। जब तक एक दिशा में नेत्रों को चौंधियाती हुई, कानों को फाड़ती हुई, देखने वालों को कॅपाती हुई, जंगली जीवों को भयभीत करती हुई, आकाश को चीरती हुई, बादलों को सोने की चाबुक से मानो पीटती हुई, अन्धकार को अग्नि से जलाती हुई-सी बिजली चमकती है, तब तक दूसरी दिशा में भी बादलों को ज्वाला के समूह से ढक लेती है। चमक के बाद चमक, गर्जना के बाद गर्जना, इस प्रकार सैकड़ों से भी अधिक तोपों के चलने से उत्पन्न हुए के समान घोर शब्द से वह वन भर गया, परन्तु इस समय भी ‘या तो कार्य को पूरा करूगा या शरीर को नष्ट कर दूंगा’ इस प्रकार की प्रतिज्ञा करने वाला वह वीर शिवाजी का दूत अपने कार्य (कर्तव्य) से नहीं रुकता है।

(5) यस्याध्यक्षः स्वयं परिश्रमी, कथं स न स्यात् स्वयं परिश्रमी? यस्य प्रभुः स्वयं अदभुतसाहसः, कथं स न भवेत् स्वयं तथा? यस्य स्वामी स्वयमापदो न गणयति, कथं स गणयेदापदः? यस्य च महाराजः स्वयंसङ्कल्पितं निश्चयेन साधयति, कथं स न साधयेत् स्व-सङ्कल्पितम्? अस्त्येष महाराज-शिववीरस्य दयापात्रं चरः, तत्कथमेष झञ्झाविभीषिकाभिर्विभीषितः प्रभु-कार्यं विगणयेत्? तदितोऽप्येष तथैव त्वरितमश्वं चालयंश्चलति। [2013]

शब्दार्थ कथं = कैसे। प्रभुः = स्वामी। स्वयमापदः = अपने आप आपत्तियों को। गणयेदापदः = गिने, आपत्तियों को। साधयति = पूरा करता है। साधयेत् = सिद्ध करे। अस्त्येषः (अस्ति + एषः) = है यह। विभीषिकाभिर्विभीषितः = भयों से डरा हुआ। विगणयेत् = उपेक्षा करे, त्याग दे। त्वरितमश्वं = तेज गति से घोड़े को। चालयन् = चलाता हुआ।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में शिवाजी के अनुचर के दृढ़-संकल्प, वीरता और स्वामिभक्ति का वर्णन किया गया है।

अनुवाद जिसका (सेना) अध्यक्ष स्वयं परिश्रमी है, वह स्वयं परिश्रमी क्यों न हो? जिसका स्वामी स्वयं अद्भुत साहसी है, वह स्वयं साहसी क्यों न हो? जिसका स्वामी स्वयं आपत्तियों की गणना (परवाह) नहीं करता है, वह क्यों आपत्तियों की गणना (परवाह) करे? जिसका राजा स्वयं संकल्प किये गिये कार्य को निश्चय से पूरा करता है, वह क्यों न अपने संकल्पित कार्य को पूरा करे? यह महाराज और वीर शिवाजी को दयापात्र अनुचर है तो कैसे यह वर्षा और आँधी के भय से डरकर स्वामी के कार्य की उपेक्षा करे? तो यह यहाँ से भी उसी प्रकार घोड़े को तेज चलाता हुआ चला जा रहा है।

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