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UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 6 कार्यं वा साधयेयं देहं वा पातयेयम् (गद्य – भारती) लघु उत्तरीय

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प्रश्न 1.

श्री रघुवीर सिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर :

रघुवीर सिंह शिवाजी का एक विश्वासपात्र सेवक है। वह उनका एक आवश्यक और गोपनीय पत्र लेकर सिंह दुर्ग से तोरण दुर्ग की ओर जा रहा है। तेज वर्षा और आँधी जैसे प्रतिकूल मौसम में जब रास्ता भी

स्पष्ट नहीं दिखाई पड़ रहा था, घोड़ा क्षण-प्रतिक्षण चिकनी चट्टानों पर बार-बार फिसल जाता था, वृक्षों की शाखाओं से लगातार प्रताड़ित होता हुआ भी यह दृढ़-संकल्पी वीर आगे बढ़ता ही चला जा रहा था। लगाम हाथ में पकड़े, घोड़े के कन्धों और गर्दन को हाथ से थपथपाता हुआ और प्रतिज्ञा करता हुआ कि “या तो कार्य पूरा करके रहूँगा या मर मिटूगा’ अपने कार्य से लौट नहीं रहा था। निश्चय ही रघुवीर सिंह एक परिश्रमी, अद्भुत साहसी, दृढ़-संकल्पी, विपत्तियों में धैर्यशाली और विश्वासपात्र सेवक था।

प्रश्न 2.

तोरण दुर्ग जाते समय रघुवीर सिंह के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का वर्णन कीजिए।

उत्तर :

तोरण दुर्ग जाते समय अचानक बड़ी तेज वर्षासहित आँधी उठी। शाम का समय होने के कारण स्वाभाविक रूप से अन्धकार घिरा था और वह अन्धकार मेघमालाओं से दुगुना हो गया था। एक पर्वतश्रेणी से पर्वतमालाओं तक, वन से वनों तक, चोटी से चोटियों तक, झरने से झरनों तक, पर्वत की घाटी से पर्वत की घाटियों तक, तलहटी से तलहटियों तक जाने का कोई सीधा रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। क्षणक्षण पर घोड़े के खुर चिकने पत्थर के टुकड़ों पर फिसल रहे थे तथा कदम-कदम पर तेज हिलते हुए वृक्षों की शाखाएँ सामने से लगकर चोट कर रही थीं, परन्तु दृढ़-संकल्प वाला यह घुड़सवार चलता ही जा रहा था।

प्रश्न 3.

रघुवीर सिंह के शारीरिक गठन का वर्णन कीजिए।

उत्तर :

रघुवीर सिंह एक सोलह वर्ष का गौरवर्ण युवक है। इसका शरीर सुगठित और दृढ़ है, बाल काले, गुच्छेदार और धुंघराले हैं, कपोल सुन्दर हैं तथा मुख कमल के समान है। थकान के कारण इसका मस्तक, कपोल, नाक एवं होंठ पसीने की बूंदों से आच्छादित हैं। यह हरे रंग का कुर्ता पहने हुए है और इसी रंग की पगड़ी धारण किये हुए है।

प्रश्न 4.

रघुवीर सिंह का स्वामी कौन है और वह कैसा है?

या

शिववीर के पत्रवाहक सेवक का क्या नाम था? 

या

रघुवीर सिंह किसका विश्वासपात्र सेवक था? 

उत्तर :

रघुवीर सिंह के स्वामी महाराज शिवाजी हैं। महाराज शिवाजी परिश्रमी और अद्भुत साहसी हैं। वे आपत्तियों की परवाह नहीं करते और संकल्पित कार्य को निश्चित ही पूरा करते हैं। उनका विश्वासपात्र, पत्रवाहक और सेवक रघुवीर सिंह भी उनके जैसा ही है।

प्रश्न 5.

“कार्यं वा साधयेयं, देहं वा पातयेयम्’ का मूल उद्देश्य क्या है?

उत्तर :

“कार्यं वा साधयेयं, देहं वा पातयेयम्” सूक्ति का मूल उद्देश्य हमें यह समझाना है कि किसी भी कार्य को करते समय हमें उसमें दत्त-चित्त होकर लग जाना चाहिए। उस कार्य को सम्पन्न करने में हमारे सामने चाहे कितनी भी और कैसी भी परेशानियाँ क्यों न आये, हमें अपने कार्य से विरत नहीं होनी चाहिए।

या तो कार्य पूरा करूगा या मर मिटूगा’ के संकल्प से उस कार्य में लगे रहना चाहिए।

प्रश्न 6.

‘कार्यं वा साधयेयं, देहं वा पातयेयम्’ प्रतिज्ञा किसने की थी? 

उत्तर :

“कार्यं वा साधयेयं, देहं वा पातयेयम्’ प्रतिज्ञा महाराज शिवाजी के सेवक रघुवीर सिंह ने की थी, जब वह उनका एक गोपनीय पत्र लेकर सिंह दुर्ग से तोरण दुर्ग की ओर जा रहा था।

प्रश्न 7.

शिवाजी के अनुचर रघुवीर सिंह की प्रतिज्ञा संस्कृत में लिखिए।

या

शिवाजी के वीर अनुचर रघुवीर सिंह का प्रतिज्ञा वाक्य क्या था

या

शिवाजी के वीर अनुचर का नाम और उसकी प्रतिज्ञा का उल्लेख कीजिए।

उत्तर :

शिवाजी के अनुचर रघुवीर सिंह की संस्कृत में प्रतिज्ञा है-कार्यं वा साधयेयं, देहं वा पातयेयम्।

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